Monday, May 24, 2010

सलाम करता हूँ

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सूरज को चन्दा से मुहब्बत है अगर
बादल को धरती से मुहब्बत है अगर
तो
सलाम करता हूँ
इन मुहब्बत वालों को
जो मिलते नहीं कभी
मगर
आईने हैं इक दूजे के
सदियों से

जिसे कभी कोई पीर न मिला
जिसे कोई रहनुमा न मिला
वो
पा जाय गर सच को
ऐसे
किसी बुद्ध जैसे को
सलाम करता हूँ मै
जिसकी चमक है
सदियों से.

जिसने दुश्मन को भी अपना समझा
पराये गम को अपना गम समझा
जो मौत से आगाह था
फिर भी
दर्दनाक मौत को गले लगाया
ऐसे किसी मसीह को
सलाम करता हूँ मै
जिसकी नूर
सबके दिलों में है
सदियों से.

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Tuesday, May 18, 2010

परवाना तड़पता ही रहता है

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पहले सूखे पत्तों की आग थी
कुछ वक्त बाद दीये की
परवाना तड़पता भी था
और
मरता भी
मगर
आज युग ने पत्ते उड़ा दिये
खुला दीया भी नहीं मिलता
बल्ब की बिजली है
परवाना तड़पता ही रहता है
मगर
मरता नहीं.
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Tuesday, May 11, 2010

बगिया



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कुछ नीम लगे हैं कुछ आम
कुछ महुवे कुछ बेर के पेड़
बैठे हम मकाँ से दूर यहाँ
फिर भी लगे है अपनापन

कुछ पंछी बाजू से गुजरें
कुछ ऊपर कच्चे आम कतरते
घर के नकली खिलौने हैं दूर
इन खिलौनों में है अपनापन

दुपहरिया हो या सांझ सुबह
मौसम एक सा देती बगिया
घर की नकली हवाएं कसैली
इसकी हवा में अपनापन.
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Friday, April 30, 2010

कोई /कुछ

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कोई चन्द खिलौने ले आया है
कोई खेल उसे झुठलाया है
कुछ की अधरों पे नसीबी है
कुछ ने आंसू ही बहाया है

कोई हरदम गम की शोर मचाये
कोई गम को ही मुस्कान बनाये
कुछ पिचकारी की फुहार बनाते
कुछ दरया में ही जा नहाये

कोई मकाँ की मंजिलें बढ़ाये
कोई कर्म से झोपड़ी ही पाये
कुछ औरों में ही उलझते रहे
कुछ खुद में ही गोते लगाये

कोई क्रोध करे लाचारी से
कोई झूठ कहे सुतारी से
कुछ ने मुहब्बत घर लाया
कुछ मरे प्यार की बीमारी से.
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Saturday, April 3, 2010

मै और कायनात


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अपनी कुदरत के साथ
ये पृथ्वी
माफताब को लिए हुए
कुछ और आकाशीय पिंडों के साथ
आफताब को घेरने की
कोशिश करती है,

इस तरह के कई समूह
जो अन्तरिक्ष में हैं
मिलकर गैलेक्सी बना देते हैं
और गैलेक्सियां मिलकर
कायनात की भौतिक संरचना
बयां करती हैं,

कायनात की भौतिकता
विशाल होते हुए भी
इंसानी विचारों में
सिमट जाती है,
मगर,सच
अर्थात
'सम्पूर्ण में निहित
सम्पूर्ण के अस्तित्व का ज्ञान'
हमसे अलहदा ही रहता है,

इसी अज्ञानता में
मै इस कायनात को
माँ कहता हूँ
तो अच्छा लगता है
क्यूंकि
इसी की गोद में
ये दुनिया पलती है.
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Thursday, March 25, 2010

मेरी तो बस कलम है

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अँधेरे के पीछे क्यूँ भागते हो
रोशनी की गैर-हाजिरी को पढो
आइन्स्टाइन ने कहा था ऐसा
मेरी तो बस कलम है,

अकेले चलने में डरो न कभी
दुनिया बाद में पीछे जरूर आएगी
बुद्ध की करनी थी ऐसी
मेरी तो बस कलम है,

हिंसा यूँ ही न करते फिरो
करो जब अहिंसा से सत्य न कायम हो
कृष्ण ने कहा था ऐसा
मेरी तो बस कलम है,

माफ़ कर दो उन सभी को दिल से
जो सत्य से परे हैं फिरते
यीशु ने कहा था ये
मेरी तो बस कलम है.

Friday, March 19, 2010

कर मन की गति न्यारी (गीत)

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सब बतियाँ अब दिल में रखियाँ
बाहर की विधि खारी
सुन रे,कर मन की गति न्यारी

गम जो कहेगा तो वो हँसेंगे 
तब विपदा हो भारी
सुन रे,कर मन की गति न्यारी

न कर वो जो रंजिश में है
कर जो लगे है प्यारी
सुन रे,कर मन की गति न्यारी .

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